Sunday, 1 July 2018

कौन कहता है ?

कौन कहता है? (४)

कौन कहता है, मुहब्बत, तिजारत नहीं होती ?
ये आरज़ूओं का  वफ़ा से सौदा ही तो है !!

किताब में जो छुपा रक्खी है ग़ुलाब, क्या पैग़ाम है ख़ाली ?
इज़हार-ओ- इकरार का ये मसौदा भी तो है !!

कौन कहता है? (४)

दगा देता है जो, वही गुनहग़ार यहाँ !
बेतफतीश भरोसा करना (२), गुनाह उससे भी ज़ादा ही तो है !!

क्या ग़िला करू?  दिल दिया तो तोड़ा गया ? ग़र ज़रूरी था इतना, क्यों छोड़ा गया ?
हर शख्स फना होने को तैयार कहाँ ? ज़माने में लोगो का ग़लत इरादा भी तो है !!

कौन कहता है? (४)

कौन कहता है, सिर्फ एहसासों से ईबादत नहीं होती ?
ये अश्कों से बना दर्द का घरोंदा ही तो है !!

ये जो तकिये से सिमटी नमी है यहाँ,
तन्हाइयों में यादों को मिला ओहदा ही तो है !!

कौन कहता है? (७)


Friday, 26 January 2018

यूँही कभी कभी

आज भी मैं कभी कभी,
उन गलियों से आता जाता हूँ ,
जहाँ तुम्हारे कदम पड़े , कभी कभी
मैं उनके सजदे कर आता हूँ। 

जब यादें तुम्हारी सताती है, कभी कभी
तनहा राहों में निकल जाता हूँ।
बेतुकी कल्पनाओं से, कभी कभी
अपनी फूटी किस्मत को बहलाता हूँ।

जिन मंज़रों में तुम्हे पाना नामुमकिन है,
कभी कभी, वहीँ तुम्हे ढून्ढ अता  हूँ।
खबर मिली नहीं के तुम आये हो,  कभी कभी,
कदम खुद-ब-खुद चलने लगते हैं , रोक नहीं पाता हूँ।

फिर लगता है कभी कभी,
गुन्हेग़ार हूँ तुम्हारा, ज़िद यहीं छोड़ जाता हूँ।
किस गुन्हा की सजा मैं खुदको दे रहा हूँ,
सोचकर फिर , खुद ही हैरान सा हो जाता हूँ।

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