Tuesday, 27 February 2024

मुहोब्बत की दुकान और मैं !

माना की अकेला हूँ बरसों से,
किसीको हमसे मुहोब्बत नहीं है अर्सों से !
हमे जिनकी अरमान हुई, पाने की प्यास जगी,
उन्हें कोई और भा गया, वो उनके साथ भगी !!

 लुट जाये तो लुट जाये  उमीदें और अरमान  सभी 
कोई हमारी पसंद से आबाद, मेरा ऐहसान सही !!
और  तुमने जो खोली है , मुहोब्बत की दूकान यहाँ 
भीड़ तो जुटी होगी, बहोत है अकेलेपन  से परेशान यही !!

कोई परेशान है यहाँपर साथ वाले से भी,,
परेशान है कोई सच्ची बात करने वालों से भी !!
मुहोब्बत की दूकान पे, क्या ये साथ वाले बिकजायेंगे?
सच की कड़वाहट दूर हो, ऐसे झूठ टिक जायेंगे ? 

बिकती है मुहोब्बत वहीँ, जहाँ उसकी कद्र  नहीं होती!
लम्पट होते है प्रेमी, प्रेमिकाएं भद्र नहीं होती !
टंगी है तुम्हारे दूकान पे वो वासना है प्रेम की शॉल ओढ़े !
ज़िन्दगी बर्बाद होती है इनसे, बस बनते है माहौल थोड़े !!

 
मुहोब्बत एकतरफा सही पूँजी है, एहसास सच्च्चे है !!
हमे नहीं जाना इस दूकान को ओर, हम अकेले ही अच्छे है !
हमे खोलना होगा तो प्रेम का मंदिर बनाएंगे !
राधा और मीरा की तरह अपनी प्रीत निभाएंगे !!



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