Wednesday, 24 June 2026

हो कहाँ तुम ?

 हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम,

हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…

अरे सुनने की ज़ेहमत लो,

तुम ना रहे तुम…

हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…


तुम में ही बोया है,

जिसे मैंने चाहा है,

मन में जिसकी छाया है,

कई बार पहले पाया है…

किया तुमने उसको जाने कहाँ गुम,

हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…


हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…

जरा सुनने की ज़ेहमत लो…

हो कहाँ तुम…


ये जो सारे सितम हैं तुम्हारे,

सुनो, मेरे दीवानगी से हारे…

तुम्हें पाना हसरत नहीं है, है कसम,

ज़रूरत खास ज़िन्दगी की हो तुम…

हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…


हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…

अरे सुनने की ज़ेहमत लो…

हो कहाँ तुम…

 हो कहाँ तुम…

तुम में ही गुम…


पर तुम तो ऐसे ठुकरा के चल दी,

देख मेरी परछाई, अपने राहें बदल दी…

आसान नहीं यूँ, पीछा छुड़ा के हो जाना गुम…

हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…


हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…

जरा सुनने की ज़ेहमत लो…

तुम ना रहे तुम…

हो कहाँ तुम…

आखिर हो कहाँ तुम…

Monday, 2 February 2026

हम कितने नादाँ...।

कितने नादां थे, इस बात से बचते रहे। 
हम अपनी हसरतों को मुहब्बत समझते रहे।
कितने नादां... 

जिनकी चाहत की, उनके भी तो अरमां होंगे।
जरूरी थोड़े है, वो भी हमपे मेहरबाँ होंगे। 
ख़ुदपे भी तो कुछ किया काम, होता। 
हमें पाकर, उनको भी गुमान हुआ होता।
कितने नादाँ... 

 ना औकात से ज्यादा, ना मिला है किस्मत से कम कभी।
बेतहाशा पाने पे खुश, और ना पाने पे हुए ग़म कई।
जिस उम्मीद पे जीता है, वही करता है आंखे नम कभी। 
जुनून पे था भरोसा, और तकव्वुर हुआ ना कम कभी ।
थोड़ा ऐतराम, मेहनत ओ शिद्दत पे ऐतबार से बचते रहे। 

कितने नादां थे, इस सच्चाई से बचते रहे।
हम अपनी हसरतों को मुहब्बत समझते रहे
कितने नादाँ... कितने नादाँ... हम कितने नादाँ...। 



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