हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम,
हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…
अरे सुनने की ज़ेहमत लो,
तुम ना रहे तुम…
हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…
तुम में ही बोया है,
जिसे मैंने चाहा है,
मन में जिसकी छाया है,
कई बार पहले पाया है…
किया तुमने उसको जाने कहाँ गुम,
हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…
हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…
जरा सुनने की ज़ेहमत लो…
हो कहाँ तुम…
ये जो सारे सितम हैं तुम्हारे,
सुनो, मेरे दीवानगी से हारे…
तुम्हें पाना हसरत नहीं है, है कसम,
ज़रूरत खास ज़िन्दगी की हो तुम…
हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…
हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…
अरे सुनने की ज़ेहमत लो…
हो कहाँ तुम…
हो कहाँ तुम…
तुम में ही गुम…
पर तुम तो ऐसे ठुकरा के चल दी,
देख मेरी परछाई, अपने राहें बदल दी…
आसान नहीं यूँ, पीछा छुड़ा के हो जाना गुम…
हो कहाँ तुम… आखिर हो कहाँ तुम…
हो कहाँ तुम, तुम में ही गुम…
जरा सुनने की ज़ेहमत लो…
तुम ना रहे तुम…
हो कहाँ तुम…
आखिर हो कहाँ तुम…
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